Friday, October 7, 2022

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डॉक्टरों को अनिवार्य सेवा देने की नीति सही, सरकार को पॉलिसी बनाने का अधिकार :सुप्रीम कोर्ट

→अनिवार्य सेवा देने के लिए कह सकती है राज्य सरकार- कोर्ट

→बांड का पालन न करने वालों पर 10 से 50 लाख रुपये जुर्माने का भी प्रावधान

→सरकारी अस्पतालों में सेवा देने को बंधुआ मजदूरी नहीं कह सकते डॉक्टर

नई दिल्ली (एडवोकेट प्रताप सिंह सुवाणा)

सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि परा स्नातक और सुपर स्पेशलिटी कोर्स में दाखिले के वक्त डॉक्टर जो बांड भरते हैं, उन्हें उनका पालन करना होगा। शीर्ष अदालत ने कहा कि राज्य सरकार अपने अधिकारों का इस्तेमाल कर डॉक्टरों को अनिवार्य सेवा देने के लिए कह सकते हैं। कोर्ट ने दोटूक कहा है कि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन नहीं है।

जस्टिस एल नागेश्वर राव और जस्टिस हेमंत गुप्ता की पीठ ने व्यापक जनहित और चिकित्सा सेवा से महरूम समुदाय को लाभ पहुंचाने के मद्देनजर विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा डॉक्टरों को कोर्स पूरा करने केबाद एक से पांच वर्ष तक के लिए जन सेवा करने संबंधी बांड थोपने को सही करार दिया है। मालूम हो कि इस बांड का पालन न करने वालों पर 10 से 50 लाख रुपये जुर्माने का भी प्रावधान है। पीठ ने हिमाचल प्रदेश, आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, ओडिशा, पश्चिम बंगाल, राजस्थान सहित अन्य राज्यों द्वारा थोंपे गए ऐसे बांड को सही करार दिया है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा है कि अल्पावधि के लिए काम करने के एवज में वजीफा पाने वाले डॉक्टर यह शिकायत नहीं कर सकते कि उनसे बंधुआ मजदूर की तरह काम लिया जाता है। खासकर वह भी तब जबकि उन्हें कोर्स में दाखिले के वक्त इन बातों की जानकारी होती है। कोर्ट ने कहा कि सरकारी अस्पतालों में सेवा देने को डॉक्टर किसी भी तरीके से बंधुआ मजदूरी नहीं कह सकते। कोर्ट ने एसोसिएशन ऑफ मेडिकल सुपर स्पेशलिटी एसपाइरेंट एंड रेजिडेंट्स सहित अन्य द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए यह बात कही है।

हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार और मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया को सरकारी कॉलेजों से प्रशिक्षित डॉक्टरों के लिए अनिवार्य सेवा को लेकर एकसमान नीति बनाने के लिए कहा है। सुप्रीम कोर्ट ने विभिन्न पहलुओं पर गौर करने के बाद इस दलील को खारिज कर दिया कि डॉक्टरों के लिए जन सेवा के लिए बाध्य करना संविधान के अनुच्छेद-21(जीवन जीने का अधिकार) का उल्लंघन है।

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