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कोरोना महामारी के चलते इंसानियत हुई शर्मसार , पिता ने मृत बेटी को कंधो पर शमशान घाट तक पहुँचाया

जालंधर , 15 मई ( देव राज ) 

कोरोना महामारी के चलते कई बार इंसानियत को शर्मसार होते देखा गया है क्योंकि यह महामारी एक ऐसी बीमारी है जिसका पता ही नहीं चलता कि वह जब किसी को अपनी गिरफ्त में लेले और इसी के डर से इंसानियत शर्मसार होती आ रही है एक 11 साल की मासूम का कोरोना के कारण निधन हो गया और उसे कंधा देने के लिए कोई आगे नहीं आया। वहीं उसका बुजुर्ग पिता ने उसे अपने कंधे पर श्मशान घाट लेकर गया।

रामनगर की रहने वाली 11 साल की सोनू का कोरोना के कारण देहांत हो गया और जैसे जैसे लोगों को पता चला कि उक्त लड़की को करना था तो उठ के सब को कंधा देने के लिए भी कोई आगे नहीं आया है और उसका बुजुर्ग पिता उसे अपने कंधे पर उठाकर शमशान तक लेकर गया जिसकी वीडियो वायरल होने के बाद प्रशासन में हड़कंप सी मच गई है क्योंकि यह एक बहुत बड़ी प्रशासनिक लापरवाही है और इंसानियत को शर्मसार करने वाली तस्वीरें है हालांकि कोरोना महामारी के चलते प्रशासन ने बहुत शक्ति कर रखी है और ऐसे समय में अगर किसी की कोरोना के कारण मृत्यु होती है तो उसका दाह संस्कार करने का जिम्मा प्रशासन खुद निभाता है पर इस बुजुर्ग को अपनी बच्ची के संस्कार के लिए खुद अपने कंधे पर उठाकर श्मशान घाट तक ले जाना पड़ा।

मृतक बच्ची को कंधे पर लेकर जाते पिता

प्रशासन की लापरवाही, सिस्टम नहीं बदल सकता !

रितिक सोनू के पिता दिलीप कुमार ने कहा कि सिविल हॉस्पिटल जालंधर ने उनकी बेटी को अमृतसर रेफर कर दिया था जहां पर उन्हें खून की एक बोतल 4500/- रुपए की मिली और बच्चे के देहांत के बाद उन्होंने 2500/- एंबुलेंस की भी चार्ज किए पर प्रशासन की ओर से किसी तरह की कोई भी सुविधा नहीं मिली। दिलीप ने कहा कि जब वह घर वापस पहुंचा तो आस पड़ोस वालों ने भी उसे साफ कह दिया कि उसके बच्चे की मौत कोरोना के कारण हुई है इसलिए वह कोई भी उसके बच्ची को हाथ नहीं लगाएंगे। उसके संस्कार का इंतजाम उसे खुद ही करना होगा और उसके पास अपनी बच्ची को कंधे पर उठाकर श्मशान घाट तक ले जाने के इलावा कोई भी रास्ता नहीं बचा था।

कोरोना महामारी ने सभी को खुदगरज बना कर रख दिया है।  जैसे ही किसी को किसी अन्य व्यक्ति के कोरोना पॉजिटिव होने का पता चलता है तो वह उससे इतना भेदभाव करने लग जाते हैं कि उस कोरोना मरीज से सामाजिक रिश्ते भी तोड़ देते हैं । एक तो मरीज को महामारी के परिणाम का भय होता है और दूसरा जब लोगों से सामाजिक रिश्ता भी तोड़ लेते हैं तो वह अपनी हिम्मत ही छोड़ देता है और इस तरह की तस्वीरें देखने को मिलती है जो इंसान को इंसानियत की नजरों से गिरा देती है।

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