पिहोवा 11 मई ( मुकेश डोलिया) ये जो शरीर है, इसको हमने गाड़ी कहा। गाड़ी में भी कहीं पर कुछ ऊर्जा जाती है, जैसे पेट्रोल या अन्य साधन। संसार की कोई भी चीज़ बिना ऊर्जा के नहीं चल सकती। ऐसे ही हमारा शरीर भी बिना ऊर्जा के नहीं चलता है। शरीर में जीवन एक बैटरी की तरह है। वही ऊर्जा, चेतना, आत्मा, जो हमारे इस शरीर में प्रवेश करती है, एक दिन चली जाती है। जब इस शरीर में ऊर्जा आई तो हमने कहा जन्म हुआ, और वही ऊर्जा जब इस शरीर से बाहर जाती है, उसको हमने मृत्यु कहा। ऊर्जा है तो दिमाग भी काम कर रहा है, आँख भी देख रही है, कान सुन रहा है, मुँह स्वाद ले रहा है, पैर चलते हैं, हाथ चलते हैं। पर जैसे ही ये ऊर्जा निकलती है, तो ये शरीर किसी काम का नहीं रहता है, जिसे हम मृत्यु कहते हैं। और फिर इस शरीर का अंतिम संस्कार करना होता है।
इस गाड़ी को जिसने बनाया, उसे हम अलग-अलग नामों से पुकारते हैं। कोई उसको भगवान, कोई श्रीराम, कोई श्रीकृष्ण, बुद्ध, महावीर, जीसस, मोहम्मद, कबीर, फरीद, कबीर, गुरु नानक देव, राम परमहंस, साईं बाबा, मीरा बाई, सहजो बाई, लल्ला बाई कहता है। ये सब नाम संसार में हमने सुने ही हैं। ये भगवान या भक्त कहलाते हैं। भगवान ने इस गाड़ी को बनाया है, और उसकी मरम्मत और सेवा करने का काम डॉक्टर, सिस्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ को दिया है। इसलिए मैं हमेशा कहता हूँ कि डॉक्टर और नर्स या पैरामेडिकल स्टाफ, सभी भगवान के दाहिने और बाएँ हाथ हैं। भगवान ने इन सभी को एक विशेष कर्तव्य के लिए चुना है।
परमात्मा ने जिस शरीर को बनाया, उसके सर्विस स्टेशन के लिए डॉक्टर, सिस्टर्स और पैरामेडिकल स्टाफ को नियुक्त किया। ये सभी भगवान के बहुत करीब हैं। शरीर भगवान द्वारा बनाया गया है, इसलिए इस दुनिया में इन सभी का कर्तव्य सर्वोच्च है और भगवान की मर्जी के बगैर इसमें कोई काम नहीं कर सकता। उसी परमात्मा ने अपनी बनाई इस गाड़ी की मरम्मत के लिए किसी को डॉक्टर, किसी को नर्स, और इन सभी को सेवा के लिए नियुक्त किया है। तो ये सभी भाग्यशाली हैं, क्योंकि भगवान ने इनको चुना है। जब कोई तकलीफ में होता है, चाहे पेट दर्द या कैंसर जैसी बीमारी इत्यादि, तो हमेशा हर कोई भगवान की ओर देखता है। जो सेवा घर में कोई नहीं कर सकता, वो सेवा ये सभी लोग करते हैं। तो जीवन का कितना बड़ा काम इनके सुपुर्द किया गया है।
इस संसार में सेवा ही भगवान का दाहिना और बाहिना हाथ है। जब मरीज़ इनके पास आता है, तो असल में भगवान ही उस चेहरे के साथ इनके पास आते हैं। उस चेहरे में परमात्मा उपस्थित है, क्योंकि हमारे अंदर जो ऊर्जा है, वो परम ऊर्जा का ही एक अंश है, जिसको हम भगवान कह देते हैं। तो ये खेल समझना है। जिसने ये समझ लिया, वो भगवान हो गया। जब हम ये समझ जाएँगे, तो हम अपना कर्म भी बड़े आनंद से करेंगे।
इन सभी को परमात्मा ने चुना है, तो परमात्मा का लक्षण है मुदिता, मिठास और करुणा। करुणा मतलब जो हुआ,अच्छा हुआ है; जो लिखा हुआ है, वही हो रहा है। करुणा किसी से अटैच नहीं होना, बल्कि प्रेम करना है। मुदिता का अर्थ है, हमेशा मीठा बोलना। मैत्री का अर्थ है, सभी से प्रेमभाव और धीरज बनाए रखना। तब समझ आता है जीवन का वह अंतिम लक्ष्य जिसे प्राप्त करना है। जिसे मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, स्थितिप्रज्ञा, कैवल्य कहा जाता है। यह यहीं, इसी जीवन में प्राप्त हो सकता है। इसलिए अंदर से शांत और रिलैक्स में रहें। ये आत्मा से परमात्मा तक का विकास है। इसी में आनंद है, और इसी में सच्ची शांति की गारंटी है।
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